रुकना प्रकृति की आदत ही नहीं है। अगर प्रकृति रुक गई तो मानो प्रकृति का विकास रुक जायेगा और इस प्रकृति का कोई अस्तित्व नहीं रह जाएगा किंतु प्रकृति कतई नहीं रुकती यह भी यथार्थ सत्य है। इस प्रकृति को देखकर मेरे मन में बहुत से खयालात उठने लगे कि जब प्रकृति नहीं रुकती तो हम क्यों रुक जाते हैं
इसी पर मैंने चंद शब्द लिखे हैं
क्या नदी कभी रुकती है? नहीं, तो तू क्यों रुका है।
क्या लहरेे कभी रुकती है? नहीं तो तू क्यों रुका है।
क्या समय कभी रुकती है? नहीं, तो तू क्यों रुका है।
क्या पवन कभी रुकती है? नहीं, तो तू क्यों रुका है।
क्या पवन कभी रुकती है? नहीं, तो तू क्यों रुका है।
क्या सूर्योदय कभी रुकी हैं? नहीं, तो तू क्यों रुका है।
क्या ग्रह की परिक्रमा रुकी है? नहीं, तो तू क्यों रुका है।
क्या आग कभी जलाने से रूकती है? नहीं, तो तू क्यों रुका है।
क्या अश्व बीच रहा में कभी रूकती हैं? नहीं, तो तू क्यों रुका है।
क्या स्वर्ण की चमक कभी रुकती है? नहीं, तो तू क्यों रुका है।
क्या कस्तूरी की सुगंध कभी रुकती है? नहीं, तो तू क्यों रुका है।क्या वृक्ष फल देने से रुकता है? नहीं, तो तू क्यों रुका है।
क्या धरती जल देने से रुकी है? नहीं, तो तू क्यों रुका है।
क्या कमान से निकली तीर कभी रुकी है? नहीं, तो तू क्यू रुका है।
क्या रक्त की लालिमा कभी रुकती है? नहीं, तो तू क्यों रुका है।
क्या रक्त की लालिमा कभी रुकती है? नहीं, तो तू क्यों रुका है।
दिल के दरवाजे से...❤️
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