शुक्रवार, 14 अगस्त 2020

मन



संशय की दुविधा करें मन को झकझोर।

एक तरफ है कुंआ दूसरी तरफ खाई का छोर।


मन की चंचलता करें खुद को करे ऊहापोह।

यह कठिन है समय कहता कुछ तू सोच।


अगर सोचे भी तो क्या सोचे।

एक तरफ है कुंआ दूसरी तरफ खाई का छोर।


मन करे यह करूं मन करे वह करू।

चंचल मन को क्या कहूं जो मुझे चलाने लग गया।


मार के मन को त्याग कर सुविधा मन करे वह कर।

समय नहीं है मन को सवारने की मन मार कर कर।


संशय की दूविधा करें मन को झकझोर।

एक तरफ कुआं हैं और दूसरी ओर खाई  का छोर।


Sea,occean



❤️दिल के दरवाजे से...❤️


©14August2020दिल के दरवाजे से.. मन yogendra prasad sahu All right reserved


2 टिप्‍पणियां:

  1. मन की चंचलता को ध्यान में रखते हुए मन का नियंत्रण तथा समय की महत्ता का बोध। आपके पंक्तियों ने मेरे मन को शांत कर दिया। बहुत सुंदर

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